📘 भारतीय संविधान – संघीय ढाँचा, संशोधन, आपातकालीन प्रावधान, PIL, न्यायिक पुनरीक्षण
🔹 1. संघीय ढाँचा (Federal Structure of India)
(A) संघीय विशेषताएँ
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लिखित संविधान – संविधान का आकार बड़ा (395 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियाँ)।
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संघ और राज्य सूचियाँ – अनुच्छेद 246 + सातवीं अनुसूची (Union, State, Concurrent Lists)।
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द्विसदनीय संसद – लोकसभा + राज्यसभा।
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स्वतंत्र न्यायपालिका – सर्वोच्च न्यायालय संविधान का संरक्षक।
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कठोर संविधान – अनु. 368 के तहत संशोधन प्रक्रिया।
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विभाजित वित्तीय शक्तियाँ – अनु. 268–293।
(B) एकात्मक झुकाव
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एकल नागरिकता (अनु. 5–11)।
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संविधान की सर्वोच्चता (अनु. 245)।
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आपातकालीन प्रावधान – केंद्र की शक्तियाँ बढ़ जाती हैं।
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राज्यों की सीमा/नाम बदलने का अधिकार संसद को (अनु. 3)।
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केंद्र का अवशिष्ट विषयों पर अधिकार (अनु. 248)।
👉 निष्कर्ष: भारत का संविधान “संघीय शासन व्यवस्था के साथ एकात्मक विशेषताओं वाला संविधान” है।
🔹 2. संशोधन प्रक्रिया (Amendment Process) – अनुच्छेद 368
(A) प्रकार
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साधारण बहुमत से संशोधन – नागरिकता, राज्य की सीमा/नाम, केंद्र-राज्य संबंध के कुछ प्रावधान।
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विशेष बहुमत से संशोधन – मौलिक अधिकार, DPSP, राष्ट्रपति का कार्यकाल आदि।
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विशेष बहुमत + राज्य की सहमति – संघ व राज्य सूची के प्रावधान, राज्यसभा का अस्तित्व।
(B) प्रमुख संशोधन
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1वाँ संशोधन (1951): नौवीं अनुसूची।
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42वाँ संशोधन (1976): समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, अखंडता; संसद की शक्तियाँ बढ़ीं।
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44वाँ संशोधन (1978): संपत्ति का अधिकार हटाया; आपातकाल की शर्तें कठोर कीं।
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52वाँ संशोधन (1985): दल-बदल विरोधी कानून।
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61वाँ संशोधन (1989): मतदान आयु 21 से 18 वर्ष।
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73वाँ और 74वाँ (1992): पंचायत राज और शहरी निकाय।
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86वाँ संशोधन (2002): शिक्षा मौलिक अधिकार।
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101वाँ (2016): जीएसटी लागू।
🔹 3. आपातकालीन प्रावधान (Emergency Provisions – Part XVIII, अनु. 352–360)
(A) राष्ट्रीय आपातकाल (अनु. 352)
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कारण: युद्ध, बाहरी आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह।
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प्रभाव:
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केंद्र राज्यों पर पूर्ण नियंत्रण।
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मौलिक अधिकार निलंबित (अनु. 19)।
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संसद को असीमित शक्ति।
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अवधि: 6 माह, संसद की स्वीकृति आवश्यक।
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भारत में कुल 3 बार (1962, 1971, 1975)।
(B) राज्य आपातकाल (अनु. 356)
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कारण: राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल।
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राष्ट्रपति शासन (President’s Rule)।
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अधिकतम अवधि: 3 वर्ष (हर 6 माह में स्वीकृति)।
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अब तक 100 से अधिक बार लागू।
(C) वित्तीय आपातकाल (अनु. 360)
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कारण: वित्तीय स्थिरता संकट।
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प्रभाव:
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वेतन व भत्तों में कटौती।
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राज्यों पर वित्तीय नियंत्रण।
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अब तक कभी लागू नहीं हुआ।
🔹 4. जनहित याचिका (PIL – Public Interest Litigation)
(A) परिभाषा
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कोई भी नागरिक/संगठन लोकहित में न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है।
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1980 के दशक में शुरू (न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती, वी.आर. कृष्णा अय्यर)।
(B) प्रमुख मामले
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हुसैनआरा खातून बनाम बिहार राज्य (1979): कैदियों की रिहाई।
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विश्वनाथ त्रिपाठी बनाम भारत सरकार: पर्यावरण संरक्षण।
(C) महत्व
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न्यायपालिका तक आसान पहुँच।
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गरीबों, वंचितों के अधिकारों की रक्षा।
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शासन की जवाबदेही।
(D) सीमाएँ
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PIL का दुरुपयोग – व्यक्तिगत लाभ के लिए।
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न्यायपालिका पर बोझ।
🔹 5. न्यायिक पुनरीक्षण (Judicial Review)
(A) परिभाषा
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सर्वोच्च व उच्च न्यायालय को शक्ति कि वे संसद/विधानसभा के बनाए कानूनों की संवैधानिकता की जाँच कर सकें।
(B) आधार
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अनुच्छेद 13 – संविधान विरोधी कानून अमान्य।
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अनुच्छेद 32 – मौलिक अधिकार संरक्षण।
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अनुच्छेद 226 – उच्च न्यायालय का अधिकार।
(C) प्रमुख केस
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केशवानंद भारती बनाम केरल (1973): मूलभूत संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine)।
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इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण (1975): चुनाव विवाद में न्यायिक पुनरीक्षण।
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मिनर्वा मिल्स केस (1980): DPSP और Fundamental Rights में संतुलन।
(D) महत्व
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संविधान की सर्वोच्चता सुनिश्चित।
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संसद की असीमित शक्तियों पर रोक।
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लोकतंत्र का संरक्षण।
🔹 6. त्वरित पुनरावृत्ति तालिका
| विषय | अनुच्छेद | विशेषताएँ |
|---|---|---|
| संघीय ढाँचा | 246, सातवीं अनुसूची | संघ + राज्य + समवर्ती सूची |
| संशोधन प्रक्रिया | 368 | साधारण, विशेष, विशेष + राज्य सहमति |
| राष्ट्रीय आपातकाल | 352 | युद्ध/आक्रमण/सशस्त्र विद्रोह |
| राज्य आपातकाल | 356 | संवैधानिक तंत्र विफल |
| वित्तीय आपातकाल | 360 | वित्तीय संकट, कभी लागू नहीं |
| PIL | 32, 226 | 1980s से, लोकहित याचिका |
| न्यायिक पुनरीक्षण | 13, 32, 226 | संविधान विरोधी कानून अमान्य |


