c. 1326–36: राणा हम्मीर सिंह—मेवाड़ पुनरुत्थान/चित्तौड़ पर पुनः अधिकार
दिल्ली सल्तनत से संबंध — मेवाड़, रणथम्भौर और जालोर
समग्र परिप्रेक्ष्य (Why it matters)
13वीं–14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत की पश्चिम-दक्षिणी सीमा पर राजस्थान के दुर्ग—चित्तौड़ (मेवाड़), रणथम्भौर, जालोर—रणनीतिक “डोर-नेक” थे। इन्हीं के नियंत्रण से दिल्ली–मालवा–गुजरात मार्ग, मरुप्रदेश के कारवाँ रूट, और अरावली की दर्राएँ नियंत्रित होती थीं। सल्तनत ने इन्हें बार-बार निशाना बनाया; उधर राजपूत पक्ष ने प्रतिरोध, सामंजस्य और पुनरुत्थान—तीनों रास्ते अपनाए।
1) रणथम्भौर (चौहानों का गढ़)
मुख्य प्रसंग:
-
प्रारम्भिक सल्तनती दबाव इल्तुतमिश (1226) के दौर से दिखाई देता है, पर निर्णायक मोड़ अलाउद्दीन खिलजी के समय आया।
-
1301: हम्मीरदेव (हम्मीर/हामिर) चौहान ने मंगोल-बाग़ी अमीरों को शरण दी—अलाउद्दीन ने इसे “राज्य-चुनौती” माना। दिल्ली की सेना (पहले उसके सेनापति, फिर स्वयं सुल्तान) ने लम्बा घेरा डालकर रणथम्भौर जीता; हम्मीरदेव वीरगति, दुर्ग सल्तनत के प्रशासन में समाहित।
क्यों पूछा जाता है (Exam Hooks):
-
1301—रणथम्भौर का पतन (Alau’d-Dīn vs. Hamiradeva)
-
“बाग़ी/मंगोल अमीरों को शरण” = आक्रमण का तत्काल कारण
-
अरावली–कोटा–मालवा रूट पर सल्तनती पकड़
2) मेवाड़ (चित्तौड़) — प्रतिरोध, पतन और पुनरुत्थान
मुख्य प्रसंग:
-
1303: चित्तौड़ पर अलाउद्दीन खिलजी का घेरा—लंबी घेराबंदी के बाद दुर्ग पतन; लोक-कथा परंपरा में जौहर का प्रसंग, इतिहास-लेखन में रावल रतनसिंह के दौर का पतन माना जाता है। सुल्तान ने चित्तौड़ का नाम ख़िज़्राबाद रखा (अपने पुत्र ख़िज़्र ख़ाँ के नाम पर) और सल्तनती हाकिम/सूबेदार बैठाए।
-
तुगलक-काल में मेवाड़ फिर उठ खड़ा होता है—राणा हम्मीर सिंह (c. 1326–64) के पुनरुत्थान से चित्तौड़ का पुनर्दख़ल (c. 1335–36 के आस-पास का काल-मंडल मानते हैं) और दिल्ली की स्वीकृति/संविदा का बिंदु। आगे चलकर यही धारा राणा कुम्भा–राणा सांगा–महाराणा प्रताप तक जाती है।
क्यों पूछा जाता है (Exam Hooks):
-
1303—चित्तौड़ की घेराबंदी व पतन, ख़िज़्राबाद
-
राणा हम्मीर सिंह द्वारा मेवाड़ पुनरुत्थान (तुगलक-काल)
-
“घेरा–पतन–गवर्नर–रीकन्स्ट्रक्शन” की पूरी चक्र-रचना
3) जालोर (सोंगरा चौहान) — सीमा-दुर्ग की आख़िरी दीवार
मुख्य प्रसंग:
-
1311: अलाउद्दीन खिलजी के सेनापतियों ने जालोर पर निर्णायक चढ़ाई की। कन्हाददेव (कान्हड़देव) और उनके उत्तराधिकारी वीरमदेव से कठोर प्रतिरोध के बाद दुर्ग सल्तनत के हाथ गया।
-
स्थानीय प्रबन्ध-काव्य परंपरा (जैसे कन्हडदे-प्रबन्ध) में जालोर की वीरगाथाएँ/जौहर अत्यन्त प्रसिद्ध हैं; इतिहास-लेखन में 1311 के पतन पर सहमति मिलती है।
क्यों पूछा जाता है (Exam Hooks):
-
1311—जालोर का पतन, कन्हाददेव–वीरमदेव
-
गुजरात–मालवा से आने-जाने वाले मरु-मार्गों की सुरक्षा–निगरानी
-
“अख़िरी पश्चिमी कड़ी”—सल्तनत का मरु-सीमा पर स्थायित्व
4) रिश्तों का पैटर्न: तीन सूत्र
-
तत्काल कारण → शरण/विद्रोही अमीर, कर/वसूली, मार्ग-नियंत्रण
-
रणनीति → लम्बी घेराबंदी, आपूर्ति-कटाव, तोप/मंझनीकें (प्रारम्भिक), आन्तरिक दरारें
-
परिणाम → दुर्ग पतन → सल्तनती हाकिम/मुक़्ता/इक़्ता-प्रणाली; कुछ दशकों बाद स्थानीय पुनरुत्थान (विशेषतः मेवाड़)
5) टाइमलाइन (झटपट)
-
1226: इल्तुतमिश का राजस्थान-दबाव (रं–थ–नागौर बेल्ट में अभियान) — प्रारम्भिक सल्तनती दबदबा
-
1301: रणथम्भौर (हम्मीरदेव) — अलाउद्दीन की निर्णायक जीत
-
1303: चित्तौड़ (मेवाड़) — अलाउद्दीन की घेराबंदी/ख़िज़्राबाद
-
1311: जालोर (कन्हाददेव–वीरमदेव) — सल्तनती अधिग्रहण
-
c. 1326–36: राणा हम्मीर सिंह—मेवाड़ पुनरुत्थान/चित्तौड़ पर पुनः अधिकार
6) एग्ज़ाम-केंद्रित बिंदु (One-liners/MCQs)
-
रणथम्भौर 1301 — कारण: मंगोल/बाग़ी अमीरों को शरण + रणनीतिक दुर्ग।
-
चित्तौड़ 1303 — ख़िज़्राबाद नामकरण; बाद में राणा हम्मीर सिंह का पुनरुत्थान।
-
जालोर 1311 — कन्हाददेव–वीरमदेव, सोंगरा चौहान; मरु-सीमा की “अख़िरी दीवार”।
-
सल्तनती पॉलिसी: इक़्ता/मुक़्ता–हाकिम, घेराबंदी–आपूर्ति-कटाव।
-
पैटर्न: पतन → सल्तनती प्रशासन → आंशिक शान्ति → स्थानीय पुनरुत्थान (मेवाड़)।