राजस्थान में किसान एवं जनजातीय आन्दोलन – सम्पूर्ण नोट्स (Hindi)

राजस्थान में किसान एवं जनजातीय आन्दोलन स्वतंत्रता संग्राम के सबसे ज़्यादा जमीनी, संघर्षपूर्ण और प्रभावशाली अध्यायों में गिने जाते हैं। इन आन्दोलनों ने केवल लगान, बेगार और वन–अधिकार के सवाल ही नहीं उठाए, बल्कि राजस्थान की प्रजा को यह भी सिखाया कि वे केवल शासक की “प्रजा” नहीं, बल्कि अधिकार–सम्पन्न नागरिक हैं। इस पेज में हम किसान आन्दोलन (बिजौलिया, बेगूं, मारवाड़, अलवर, बूंदी) और जनजातीय आन्दोलन (भगत आन्दोलन, मंगड़ हत्याकांड, एकी आन्दोलन, मीणा आन्दोलन) को विस्तार से, परीक्षा–उपयोगी और सरल शैली में समझेंगे।


1. भूमिका – किसान एवं जनजातीय आन्दोलन क्या थे?

  • किसान आन्दोलन – वे संघर्ष जिनमें राजस्थान के किसानों ने

    • बेइंतहा लगान,

    • बेगार (मुफ्त मज़दूरी),

    • लैगानी, नज़राना, फाइन
      जैसे आर्थिक शोषण के खिलाफ सामूहिक रूप से आवाज़ उठाई।

  • जनजातीय आन्दोलन – विशेष रूप से भील, मीणा, गरासिया, मेर आदि समुदायों द्वारा

    • जंगल, ज़मीन, पानी पर अपने पारम्परिक अधिकारों,

    • सामन्तों व अंग्रेज़ी शासन के अत्याचारों
      के खिलाफ किये गये विद्रोह व आन्दोलन।

ये दोनों आन्दोलन राजस्थान के राजनीतिक जागरण और स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण स्तम्भ माने जाते हैं – खासकर 1897–1947 के बीच।


2. किसान आन्दोलन (Peasant Movements) – सार

2.1 किसान आन्दोलनों के सामान्य कारण

  • अत्यधिक भूमि–राजस्व (Land Revenue)
    कई रियासतों में वास्तविक उत्पादन से बहुत ऊपर लगान वसूला जाता था।

  • अनेकों कर और “लैगान–लैगबग”
    चढ़ाव, चऊथ, चतुंड, फसल कर, पशु कर, घर कर, शादी–ब्याह पर टैक्स आदि।

  • बेगार प्रथा – बिना मजदूरी के मजबूरन सड़क, किले, हवेली, शिकार आदि के लिए काम कराना।

  • सूखा, अकाल, कर्ज़ और साहूकारी – बार–बार के अकाल, महाजनी ब्याज़, जमीन नीलाम होना।

  • किसान–नेतृत्व और राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रभाव – गांधीवाद, असहयोग, सविनय अवज्ञा आदि से प्रेरणा; प्रेस और राजनीतिक संगठनों का सहयोग।


2.2 प्रमुख किसान आन्दोलन – एक नजर (वर्ष–स्थान–नेता)

(कई परीक्षा पुस्तकों में ऐसे टेबल से सीधे प्रश्न आते हैं)

  • 1897–1941 – बिजौलिया किसान आन्दोलन
    स्थान: बिजौलिया जागीर, मेवाड़ (वर्तमान भीलवाड़ा)
    प्रमुख नेता: फतेहकरण चारण, साधु सीताराम दास, विजय सिंह पथिक, माणिक्यलाल वर्मा, जमनालाल बजाज।

  • 1911 – भगत किसान आन्दोलन
    स्थान: दक्षिणी राजस्थान–गुजरात का भील क्षेत्र
    नेता: गोविंद गुरु (गोविंदगिरि) – इसे कई बार किसान+जनजातीय दोनों की श्रेणी में रखा जाता है।

  • 1921–1925 – बेगूं किसान आन्दोलन
    स्थान: बेगूं ठिकाना (वर्तमान चित्तौड़गढ़)
    नेता: रामनारायण चौधरी (शुरुआत), बाद में विजय सिंह पथिक।

  • 1923 – मारवाड़ किसान आन्दोलन
    स्थान: जोधपुर रियासत
    नेता: जयनारायण व्यास, मारवाड़ हितकारिणी सभा के माध्यम से।

  • 1925 – अलवर किसान आन्दोलन / नीमूचाना काण्ड
    स्थान: नीमूचाना गाँव, अलवर
    स्वरूप: फाइन व टैक्स के खिलाफ आन्दोलन, भारी नरसंहार।

  • 1926 – बूंदी (बराड़) किसान आन्दोलन
    नेता: नाथूराम शर्मा; कारण – लगान, लगबग, बेगार; “दाबी काण्ड” प्रसिद्ध।


3. बिजौलिया किसान आन्दोलन – राजस्थान का सबसे महत्त्वपूर्ण किसान आन्दोलन

3.1 परिचय

  • स्थान: बिजौलिया जागीर, मेवाड़ – आज भीलवाड़ा ज़िले में।

  • अवधि: लगभग 1897–1941 – इसे अक्सर “दुनिया का सबसे लंबा शांतिपूर्ण किसान आन्दोलन” भी कहा जाता है।

  • प्रकृति:

    • ज़मीन्दारी–जागीरी व्यवस्था के विरुद्ध

    • अत्यधिक भूमि–कर, तमाम लगानों और बेगार के खिलाफ
      अहिंसक, संगठित और दीर्घकालीन संघर्ष

3.2 प्रमुख कारण

  • लगान के साथ–साथ अनेक कर –
    लग–बग, चढ़ाव, चतुंड, तालवार–बन्दी, फौजखर्च आदि।

  • बेगार प्रथा – जागीरदार के खेत, हवेली, शिकार आदि के लिए मुफ्त श्रम।

  • जागीर के नए अधिकारियों द्वारा जबरन वसूली और दमन।

3.3 नेतृत्व और चरण

स्रोतों में बिजौलिया आन्दोलन के कई चरण बताए जाते हैं:

  1. प्रथम चरण (1897–1915)

    • नेता: फतेहकरण चारण – प्रारम्भिक विरोध, याचिकाएँ, राजदरबार में शिकायतें।

  2. द्वितीय चरण (1915–1923)

    • नेता: साधु सीताराम दास और फिर विजय सिंह पथिक (1916 से)।

    • पथिक ने किसानों को संगठित कर “बिजौलिया किसान पंचायत / ऊपरमाल पंच बोर्ड” बनाई (1917),
      और नारा दिया – “ना लग देंगे, ना बेगार करेंगे”

    • मेवाड़ दरबार द्वारा आयोग बैठाना, रिपोर्ट में किसानों की माँगें सही मानी गयीं, पर लागू नहीं हुईं।

  3. तृतीय चरण (1923–1941)

    • नेतृत्व: माणिक्यलाल वर्मा, जमनालाल बजाज आदि।

    • 1922 के समझौते के बाद भी शर्तें पूरी न होने पर आन्दोलन फिर तेज़ हुआ।

    • अंततः 1939–41 के बीच विभिन्न करों में कटौती, बेगार प्रथा में ढील और किसानों को छोड़ी गई जमीन वापस मिलने लगी।

3.4 परिणाम और महत्त्व

  • कई प्रकार के कर समाप्त या कम हुए, बेगार प्रथा में कमी आई।

  • यह आन्दोलन राजस्थान के अन्य किसान आन्दोलनों (बेगूं, मारवाड़, बूंदी) के लिए प्रेरणा बना।

  • राष्ट्रीय स्तर पर भी इसका प्रभाव – अखिल भारतीय नेताओं का ध्यान रियासती किसानों की समस्या पर गया।

  • राजनीतिक रूप से, बिजौलिया ने राजस्थान में राजनीतिक जागरण और प्रजामंडल आन्दोलन के लिए आधार तैयार किया।


4. बेगूं किसान आन्दोलन

4.1 परिचय

  • स्थान: बेगूं (मewar की क्लास–A जागीर, वर्तमान चित्तौड़गढ़ ज़िला)।

  • अवधि: लगभग 1921–1923/25

  • प्रकृति: मेवाड़ सरकार द्वारा ऊँचे कर, लग–बग और बेगार के खिलाफ अहिंसक किसान आन्दोलन।

4.2 मुख्य बिंदु

  • 1921 में मेनाल से शुरुआत – किसानों की सभा में उचित व न्यायसंगत कर प्रणाली की मांग पर संघर्ष का संकल्प।

  • नेतृत्व

    • प्रारम्भिक नेतृत्व: रामनारायण चौधरी (विजय सिंह पथिक ने इन्हें आगे किया)।

    • बाद में प्रत्यक्ष नेतृत्व: विजय सिंह पथिक

  • किसानों की रणनीति –

    • लग–बग और बेगार न देना,

    • दरबार की अदालतों और दफ्तरों का बहिष्कार।

4.3 ट्रेंच आयोग और गोलीकाण्ड

  • सरकार ने आन्दोलन दबाने के लिए दमन और फिर ट्रेंच आयोग (Trench Commission) नियुक्त किया।

  • आयोग ने अधिकांश करों को न्यायोचित ठहराया, केवल कुछ छोटे कर घटाये।

  • 13 जुलाई 1923 – मेनाल के पास शांतिपूर्ण किसानों की सभा पर फायरिंग;
    रूपाजी और कृपाजी नामक दो किसानों की शहादत; इतिहास में “बेगूं किसान शहीद” के नाम से याद।

4.4 परिणाम

  • बेगूं में करों को निश्चित (fixed) किया गया, मनमानी वसूली पर रोक लगी।

  • बेगार प्रथा समाप्त की गई या काफी हद तक कम कर दी गई।

  • आन्दोलन ने यह संदेश दिया कि संगठित, अहिंसक किसान संघर्ष से सामंती व्यवस्था को झुकाया जा सकता है।


5. अन्य प्रमुख किसान आन्दोलन (संक्षेप में)

5.1 मारवाड़ किसान आन्दोलन (1923)

  • क्षेत्र: जोधपुर रियासत (मारवाड़)।

  • नेतृत्व: जयनारायण व्यास, मारवाड़ हितकारिणी सभा के माध्यम से।

  • उद्देश्य:

    • किसानों से वसूले जा रहे ऊँचे लगान व बेगार का विरोध,

    • जागीरदारों और दरबार के अन्याय के खिलाफ संगठित आवाज़।

  • साधन: याचिकाएँ, सभाएँ, प्रेस (पत्र “तरुण राजस्थान” के माध्यम से)।

5.2 अलवर किसान आन्दोलन और नीमूचाना काण्ड (1925)

  • पृष्ठभूमि: अलवर रियासत में फाइन व राजस्व बढ़ोतरी के विरोध में किसानों का आन्दोलन।

  • मुख्य केन्द्र: नीमूचाना गाँव

  • 14 मई 1925 – अलवर की सेना ने गाँव को चारों ओर से घेरकर बिना चेतावनी मशीनगन से गोलियाँ चलाईं,
    लगभग सैंकड़ों किसानों (कई स्रोत 800 के आसपास) की मृत्यु; इसे “नीमूचाना हत्याकाण्ड” कहा जाता है।

  • परिणाम: भारी आलोचना के बाद फाइन व टैक्स में कुछ रियायतें, पर शहीदों की बड़ी कीमत पर।

5.3 बूंदी (बराड़) किसान आन्दोलन

  • वर्ष: लगभग 1926

  • नेता: नाथूराम शर्मा

  • कारण: लगान–लगबग, बेगार, जागीरदारों का अत्याचार;
    “दाबी काण्ड” – दमनकारी कार्यवाही के रूप में जाना जाता है।


6. जनजातीय आन्दोलन (Tribal Movements)

6.1 पृष्ठभूमि – जनजातीय क्षेत्रों की स्थिति

  • प्रमुख जनजातीय समुदाय – भील, मीणा, गरासिया, मेर आदि।

  • क्षेत्र – मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, सिरोही, उदयपुर, कोटा, अजमेर आदि के पहाड़ी और वन क्षेत्र।

  • प्रमुख समस्याएँ –

    • जंगलों और चारागाहों से बेदखली (Forest Acts के बाद),

    • ज़मींदारी–जागीरी और ब्रिटिश दोनों का दोहरा शोषण,

    • शराब, कर्ज़, ठिकानेदारों की निजी फौजों का दमन,

    • “क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट” जैसे कानूनों से सामाजिक कलंक।


6.2 प्रारम्भिक भील, मीणा, मेर विद्रोह (19वीं सदी)

  • 1818 के बाद – मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा आदि में भीलों ने नई व्यवस्था और टैक्स के खिलाफ विद्रोह किये।

  • 1872–74 – बांसवाड़ा राज्य में भील विद्रोह, जिसमें ब्रिटिश–रियासती नीतियों के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध दिखा।

  • मीणा और मेर समुदायों ने भी अलग–अलग समय पर ज़मींदारों व पुलिस के अत्याचारों के खिलाफ विद्रोह किया।


6.3 भगत आन्दोलन (Bhagat Movement) – गोविंद गुरु और मंगड़ हत्याकाण्ड

(क) गोविंद गुरु और भगत आन्दोलन

  • नेता: गोविंद गुरु (गोविंदगिरि) – डूंगरपुर ज़िले के वेदसा गाँव के बंजारा/भील समाज के समाज–सुधारक।

  • प्रारम्भ: लगभग 1908 के आसपास – दक्षिणी राजस्थान–गुजरात के भील क्षेत्र में।

  • उद्देश्य:

    • शराब, जुआ, चोरी, सामाजिक कुरीतियों का त्याग,

    • शुद्ध जीवन, ईमानदारी, परिश्रम पर जोर,

    • शोषणकारी सामंतों व साहूकारों के खिलाफ संगठन।

  • यह आन्दोलन धीरे–धीरे आर्थिक–राजनीतिक रूप भी लेने लगा –
    भील अपने अधिकारों के लिए खुलकर आवाज़ उठाने लगे।

(ख) मंगड़ हत्याकाण्ड (Mangarh Massacre), 1913

  • स्थान: मंगड़ पहाड़ी – बांसवाड़ा (राजस्थान) और संथ (गुजरात) की सीमा पर अरावली क्षेत्र।

  • गोविंद गुरु ने अपने अनुयायियों को यहाँ एकत्र होने का आह्वान किया; हजारों भील यहाँ डेरा डाले हुए थे।

  • ब्रिटिश शासन और रियासती राज्यों ने इसे विद्रोह मानकर सैन्य कार्रवाई की योजना बनाई।

  • 17 नवम्बर 1913 – अंग्रेज़ी व रियासती सेना ने भील शिविर पर गोलियाँ चलाईं;
    विभिन्न स्रोतों में मृतकों की संख्या “सैकड़ों” से लेकर 1500 तक बताई जाती है।

  • परिणाम:

    • गोविंद गुरु गिरफ्तार, बाद में सज़ा व निर्वासन;

    • परन्तु यह घटना “आदिवासी जलियाँवाला बाग” के रूप में जानी जाने लगी और
      भील आन्दोलन के इतिहास में मील का पत्थर बनी।


6.4 एकी आन्दोलन (Eki / Unity Movement) – मोतीलाल तेजावत

  • नेता: मोतीलाल तेजावत – जाड़ोल (उदयपुर) क्षेत्र के निवासी;
    1920 के आसपास जाड़ोल ठिकाने में भील शोषण देख कर नौकरी छोड़ दी; आगे चलकर भीलों के नेता बने।

  • प्रेरणा: बिजौलिया किसान आन्दोलन के पैम्पलेटों और संघर्ष से प्रेरित होकर
    जंगल–पहाड़ के भीलों को भी संगठित करने का विचार।

मुख्य बिंदु

  • क्षेत्र: मेवाड़ का भोंमट/भोमांत क्षेत्र (गोगुन्दा, झाड़ोल, कोटड़ा)
    तथा डूंगरपुर–बांसवाड़ा सीमा और आज के गुजरात की सीमा तक फैला आन्दोलन।

  • मातृकुंडिया (मातृकुण्डिया) मेले में आदिवासियों ने संकल्प लिया कि
    वे जागीरदारों को अत्यधिक लगान नहीं देंगे,
    जब तक महाराणा स्वयं उनके प्रश्न न सुन लें –
    यहीं से इसे “एकी (एकता) आन्दोलन” कहा जाने लगा।

  • मांगें:

    • अत्यधिक लगान व बेगार समाप्त हों,

    • वन–अधिकारों की सुरक्षा,

    • शोषणकारी वसूली और मारपीट पर रोक,

    • अदालतों और पुलिस की मनमानी पर नियंत्रण।

दमन और नरसंहार

  • मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में भील गाँव–गाँव सभाएँ, प्रतिज्ञा–सभा और एकजुटता की शपथ लेते थे।

  • ब्रिटिश–रियासती शक्ति ने इसे खतरनाक विद्रोह मानकर दमन तेज किया।

  • 7 मार्च 1922 – पाल–डाधवाव (Pal–Dadhvav) नरसंहार
    तेजावत–प्रभावित सभा पर पुलिस/फौज द्वारा गोलियाँ चलाई गईं;
    कई शोधों के अनुसार लगभग 1200–1500 आदिवासी मारे गए।

परिणाम

  • भीलों में राजनीतिक चेतना और संगठित प्रतिरोध की भावना और प्रबल हुई।

  • राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी प्रश्नों पर ध्यान गया;
    परन्तु आधिकारिक इतिहास में इस नरसंहार व आन्दोलन को लंबे समय तक पर्याप्त स्थान नहीं मिला।


6.5 मीणा एवं अन्य जनजातीय आन्दोलन

  • मीणा आन्दोलन

    • मीणा समुदाय को Criminal Tribes Act और स्थानीय “जऱायम पेशा कानून” के तहत अपराधी–जाति माना गया,

    • चौकीदार मीणों को चोरी–डकैती की भरपाई के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता था।

    • आज़ादी के बाद Criminal Tribes Act हटाकर Habitual Offenders Act, 1952 लाया गया।

  • इन संघर्षों ने मीणाओं में भी अधिकार–चेतना और संगठित प्रतिरोध की भावना विकसित की।


7. किसान एवं जनजातीय आन्दोलन – समानताएँ और भिन्नताएँ

7.1 समानताएँ

  • दोनों का लक्ष्य सामंती–औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ संघर्ष था।

  • दोनों में आर्थिक मुद्दे –

    • ऊँचे लगान, टैक्स, बेगार, वन–अधिकार – मुख्य रहे।

  • दोनों आन्दोलनों ने राजस्थान के राजनीतिक जागरण, प्रजामंडल आन्दोलन और स्वतंत्रता संग्राम को मजबूत किया।

7.2 भिन्नताएँ (Exam Point)

  • नेतृत्व

    • किसान आन्दोलन – शिक्षित मध्यवर्ग, राजनीतिक कार्यकर्ता, वकील, समाज–सुधारक
      (जैसे विजय सिंह पथिक, माणिक्यलाल वर्मा, जयनारायण व्यास)।

    • जनजातीय आन्दोलन – स्थानीय आध्यात्मिक/समाज–सुधारक नेता
      (जैसे गोविंद गुरु, मोतीलाल तेजावत)।

  • स्वरूप

    • किसान आन्दोलन अधिकतर अहिंसक, संगठित, ज्ञापन–आयोग–समझौता की दिशा में;

    • जनजातीय आन्दोलन कई बार सशस्त्र विद्रोह या कठोर दमन–प्रतिरोध के रूप में, जंगल–पर्वत में छापामार शैली।

  • मुद्दे

    • किसान – खेत, लगान, बेगार, जागीरदारी आदि;

    • जनजातीय – जंगल अधिकार, परंपरागत स्वशासन, सामाजिक कुरीतियाँ हटाना, जातीय पहचान।


8. राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

  • किसान और जनजातीय आन्दोलनों ने

    • प्रजा को राजनीतिक रूप से जागरूक किया,

    • सामंती भय को तोड़ा,

    • “राजा प्रभु नहीं, जनता भी अधिकार–सम्पन्न है” – यह भावना पैदा की।

  • प्रजामंडल आन्दोलनों और बाद के राजस्थान एकीकरण में इन्हीं क्षेत्रों के नेता आगे रहे –
    जैसे विजय सिंह पथिक, माणिक्यलाल वर्मा, जयनारायण व्यास, गोविंद गुरु, मोतीलाल तेजावत आदि।


9. परीक्षा के लिए त्वरित सार (Quick Revision)

  • प्रश्न: राजस्थान में किसान आन्दोलनों की सबसे लंबी श्रृंखला किस आन्दोलन से जुड़ी है?
    उत्तर संकेत: बिजौलिया किसान आन्दोलन (1897–1941)

  • प्रश्न: बेगूं किसान आन्दोलन की शुरुआत कब और कहाँ से हुई, तथा प्रारम्भिक नेता कौन थे?
    उत्तर संकेत: 1921, मेनाल; प्रारम्भिक नेता – रामनारायण चौधरी, बाद में विजय सिंह पथिक।

  • प्रश्न: मंगड़ हत्याकाण्ड किस वर्ष, किस नेता के आन्दोलन से जुड़ा है?
    उत्तर संकेत: 17 नवम्बर 1913, गोविंद गुरु के भगत आन्दोलन से;
    स्थान – मंगड़ पहाड़ी (बांसवाड़ा–संथ सीमा)।

  • प्रश्न: एकी आन्दोलन (Eki Movement) किसने नेतृत्व किया और इसका प्रमुख उद्देश्य क्या था?
    उत्तर संकेत: नेता – मोतीलाल तेजावत;
    उद्देश्य – भीलों को एकजुट कर लगान, बेगार और जागीरदारी शोषण के खिलाफ एकता–आधारित आन्दोलन चलाना।

  • प्रश्न: नीमूचाना हत्याकाण्ड किस आन्दोलन से सम्बंधित है?
    उत्तर संकेत: अलवर किसान आन्दोलन (1925) – नीमूचाना गाँव में किसानों पर मशीनगन से फायरिंग।

ये राजस्थान में किसान एवं जनजातीय आन्दोलन के विस्तृत नोट्स RPSC, RAS, 1st Grade, 2nd Grade, रीट, पटवारी, पुलिस, प्रतियोगी परीक्षाओं और स्कूल/कॉलेज परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी हैं। आप चाहें तो इस पेज को PDF बनाकर या प्रिंट लेकर भी रिविजन कर सकते हैं और इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करके उनकी भी मदद कर सकते हैं।

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