राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है। इस पेज पर हम एक ही जगह पर 1857 की क्रांति, राजनीतिक जागरण, प्रजामंडल आन्दोलन, किसान आन्दोलन और जनजातीय आन्दोलन के परीक्षा–उपयोगी नोट्स दे रहे हैं।
1. राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास – संक्षिप्त परिचय
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राजस्थान उस समय अनेक रियासतों (जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर, कोटा आदि) में बँटा हुआ था।
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अंग्रेज़ सीधे शासन कम करते थे, अधिकतर रियासतों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण था।
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यहाँ स्वतंत्रता आन्दोलन दो स्तर पर चला –
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रियासतों के विरुद्ध जनता का संघर्ष (प्रजामंडल, किसान, जनजातीय आन्दोलन)
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अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़ाव।
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शुरुआती किसान–जनजातीय विद्रोह, 1857 की गूँज, फिर राजनीतिक जागरण, प्रजामंडल आन्दोलन और किसान/आदिवासी संघर्षों ने मिलकर राजस्थान में स्वतंत्रता चेतना को मजबूत किया।
2. 1857 की क्रांति (राजस्थान में संक्षिप्त परिचय)
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1857 की क्रांति की लपटें राजस्थान की रियासतों तक भी पहुँचीं।
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कोटा, नसीराबाद, बयाना, नीमच, एरिन आदि सैनिक छावनियों में विद्रोह हुए।
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कोटा में सैनिकों व स्थानीय नेताओं ने अंग्रेज़ी प्रभाव के विरुद्ध शासन संभालने की कोशिश की।
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कुछ रियासतों ने अंग्रेज़ों की मदद की (जैसे जयपुर, जोधपुर, बीकानेर), तो कुछ में क्रांतिकारी गतिविधियाँ ज़्यादा दिखीं।
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हालाँकि 1857 की क्रांति यहाँ पूरी तरह सफल नहीं हुई, लेकिन इसने आगे के जन–आन्दोलन के लिए बीज बो दिए।
3. राजनीतिक जागरण (राजस्थान) – संक्षिप्त परिचय
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19वीं–20वीं शताब्दी की शुरुआत में शिक्षा, प्रेस, समाज–सुधार आंदोलनों से लोगों में चेतना बढ़ी।
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आर्य समाज, कांग्रेस की गतिविधियाँ, अजमेर व अन्य शहरों में आधुनिक शिक्षा संस्थान – जागरण के मुख्य साधन बने।
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हरिभाऊ उपाध्याय, माणिकलाल वर्मा, विजय सिंह पथिक आदि नेताओं ने जनजागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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सार्वजनिक सभाएँ, पत्र–पत्रिकाएँ, छात्र–आन्दोलन और राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़ाव ने रियासतों की प्रजा में राजनैतिक चेतना पैदा की।
4. प्रजामंडल आन्दोलन – संक्षिप्त परिचय
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रियासतों में जनता के अधिकार लगभग नगण्य थे, शासन राजाओं–जागीरदारों के हाथ में था।
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जनता के हक़, जिम्मेदार सरकार, नागरिक अधिकार और दमनकारी करों के विरोध के लिए अलग–अलग रियासतों में प्रजामंडल बने।
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उदाहरण: जयपुर प्रजामंडल, मेवाड़ प्रजामंडल आदि – बाद में अखिल भारतीय राज्य प्रजामंडल व अखिल राजस्थान स्तर पर समन्वय।
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ये आन्दोलन अहिंसक तरीकों से – ज्ञापन, सत्याग्रह, सभाएँ, प्रदर्शन – के द्वारा रियासतों और अंग्रेज़ों पर दबाव बनाते थे।
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प्रजामंडल आन्दोलन ने रियासतों के लोकतंत्रीकरण और बाद में राजस्थान के एकीकरण की राह तैयार की।
5. किसान एवं जनजातीय आन्दोलन – संक्षिप्त परिचय
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राजस्थान में किसान अत्यधिक लगान, बेगार, जुर्माने और जागीरदारों के अत्याचार से पीड़ित थे।
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इसी के विरुद्ध बिजौलिया किसान आन्दोलन, बेगूं आन्दोलन, शेखावाटी के किसान आन्दोलन आदि हुए।
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इन आन्दोलनों का नेतृत्व विजय सिंह पथिक, माणिकलाल वर्मा, हरिभाऊ उपाध्याय जैसे नेताओं ने किया।
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जनजातीय (आदिवासी) क्षेत्रों में भी शोषण व वन–कानूनों के विरोध में भिलों आदि द्वारा आन्दोलन हुए; गोविंद गुरु का मांगढ़ आन्दोलन विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
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किसान व जनजातीय आन्दोलनों ने केवल आर्थिक शोषण के खिलाफ ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और अधिकारों की भावना को भी मजबूत किया और राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़ गए।