राजस्थान में प्रजामंडल आन्दोलन रियासती जनता द्वारा अपने राजनीतिक अधिकार, नागरिक स्वतंत्रता और जिम्मेदार शासन के लिए चलाया गया बड़ा लोकतांत्रिक आन्दोलन था। जब ब्रिटिश प्रान्तों में राष्ट्रीय आन्दोलन तेज हो रहा था, तब राजपूताना की रियासतों में जनता ने प्रजामंडल नाम के संगठन बनाकर महाराजाओं और सामंती व्यवस्था के खिलाफ संगठित संघर्ष किया। यह आन्दोलन आगे चलकर राजस्थान के एकीकरण और आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य की नींव बना।
1. भूमिका – प्रजामंडल आन्दोलन क्या था?
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प्रजामंडल आन्दोलन उन देशी रियासतों (Princely States) में चलाया गया आन्दोलन था, जहाँ प्रजा ने मिलकर
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जिम्मेदार शासन (Responsible Government),
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नागरिक अधिकार (civil liberties) और
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दमनकारी सामंती शोषण का अंत
माँगा।
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ब्रिटिश भारत के सीधे शासित प्रान्तों में कांग्रेस आदि के माध्यम से राष्ट्रीय आन्दोलन चल रहा था;
लेकिन रियासतों में सीधे ब्रिटिश संविधान लागू नहीं था, इसलिए वहाँ की जनता ने अपने–अपने “प्रजामंडल” बनाये। -
राजस्थान (तब का राजपूताना) में यह आन्दोलन बहुत तीव्र रूप से चला;
इसी को हम “राजस्थान में प्रजामंडल आन्दोलन” के नाम से पढ़ते हैं।
2. पृष्ठभूमि – देशी रियासतें और राजनीतिक स्थिति
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राजस्थान कई रियासतों में बँटा था – जयपुर, जोधपुर (मारवाड़), मेवाड़, बीकानेर, बूंदी, कोटा, धौलपुर, जैसलमेर, शाहपुरा आदि।
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इन रियासतों में शासन:
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राजाओं/महाराजाओं के हाथ में,
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नीचे जागीरदार, ठिकानेदार, सामंत।
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जनता के पास:
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मताधिकार नहीं,
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न चुनी हुई विधानसभा,
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न ही जिम्मेदार मंत्रिमंडल;
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करों, बेगार, नज़राना, लैगानी आदि से भयंकर शोषण।
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अखिल भारतीय स्तर पर 1920–30 के दशक में जब स्वतंत्रता आन्दोलन तेज़ हुआ,
तब रियासती जनता को भी अहसास हुआ कि अगर ब्रिटिश प्रान्तों में लोकतंत्र आ सकता है,
तो उन्हें भी अपने राज्यों में उत्तरदायी शासन मिलना चाहिए।
3. प्रजामंडल आन्दोलन के उद्देश्य व प्रमुख विशेषताएँ
3.1 मुख्य उद्देश्य
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रियासतों में जिम्मेदार शासन की स्थापना –
राजा/शासक मंत्रिमंडल के माध्यम से जनता के प्रति उत्तरदायी हो। -
जनता को मौलिक नागरिक अधिकार –
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वचन/अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,
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प्रेस की स्वतंत्रता,
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सभा और संगठन करने का अधिकार।
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बेगार, लैगानी, जबरन वसूली, ऊँचे लगान जैसे आर्थिक शोषण का अंत।
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न्यायिक एवं प्रशासनिक सुधार – भ्रष्टाचार कम हो, सभी के लिए समान न्याय।
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रियासतों को आगे चलकर लोकतांत्रिक भारत संघ में समाहित करना (integration with Indian Union)।
3.2 आन्दोलन की विशेषताएँ
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नेतृत्व प्रायः
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शिक्षित मध्यमवर्ग,
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किसान नेताओं,
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वकीलों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के हाथ में।
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कांग्रेस और ऑल इंडिया स्टेट्स पीपल्स कॉन्फ्रेंस से प्रेरणा; गांधीवादी तरीके – सत्याग्रह, बहिष्कार, धरना, सभाएँ।
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आन्दोलन पूरी तरह रियासती प्रजा बनाम सामंती–औपनिवेशिक गठजोड़ के रूप में उभरता है।
4. राजस्थान में प्रजामंडल आन्दोलन की शुरुआत
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1928 में “Rajputana Native States Public Council” (राजपूताना नेटिव स्टेट्स पब्लिक काउंसिल) को
राजस्थान में प्रजामंडल आन्दोलन की भूमिका (foundation) माना जाता है –
इस परिषद ने रियासतों में जनता की आवाज़ उठाने का मंच दिया। -
1930 के दशक में अलग–अलग रियासतों में प्रजामंडल बनने लगे –
इन्हीं के चलते आगे चलकर राजस्थान में प्रजामंडल आन्दोलन व्यापक हुआ।
5. राजस्थान के प्रमुख प्रजामंडल – वर्ष, संस्थापक, मुख्य नेता
(ये पॉइंट सीधे MCQ / लिखित दोनों में काम आएँगे)
5.1 जयपुर प्रजामंडल (Jaipur Prajamandal)
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स्थापना – 1931 ई.
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स्थापक / प्रमुख कार्यकर्ता –
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प्रारम्भिक गठन में: अरजुन लाल सेठी, कपूर्चंद पाटनी।
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बाद में पुनर्गठन (1936–37) में: हीरालाल शास्त्री, जमनालाल बजाज, चिरंजीलाल मिश्र प्रमुख रहे।
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इसे राजस्थान का प्रथम प्रजामंडल भी कहा जाता है।
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1938 में प्रथम वार्षिक अधिवेशन –
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अध्यक्षता: जमनालाल बजाज ने की।
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विशेष तथ्य:
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1942 में जयपुर के प्रधानमंत्री मिर्ज़ा इस्माइल और हीरालाल शास्त्री के बीच एक “जेन्टलमैन एग्रीमेंट” हुआ,
जिसके तहत जयपुर प्रजामंडल ने भारत छोड़ो आन्दोलन से दूरी बनाए रखी,
लेकिन रियासती सुधारों पर अपना संघर्ष जारी रखा।
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5.2 बूंदी प्रजामंडल (Bundi Prajamandal)
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स्थापना – 1931 ई.
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संस्थापक – श्री कांतिलाल (कई स्रोत इसे मुख्य संस्थापक बताते हैं)।
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बाद में बूंदी में “देशी राज्य लोक परिषद” भी बनी,
जो बूंदी क्षेत्र की जनता के अधिकारों के लिए सक्रिय रही।
5.3 मारवाड़ / जोधपुर प्रजामंडल (Marwar / Jodhpur Prajamandal)
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स्थापना – 1934 ई.
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रियासत – मारवाड़ (जोधपुर)।
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मुख्य नेता / संस्थापक –
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जयनारायण व्यास (शेर–ए–राजस्थान),
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अध्यक्ष: कई स्रोत भँवरलाल सर्राफ को प्रथम अध्यक्ष बताते हैं।
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पृष्ठभूमि –
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1918: चांदमल सुराणा ने “मरुधर हितकारिणी सभा” बनाई,
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1923: जयनारायण व्यास ने इसका पुनर्गठन कर “मारवाड़ हितकारिणी सभा” बनाया,
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इन्हीं से आगे चलकर मारवाड़ प्रजामंडल बना।
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5.4 हाड़ौती प्रजामंडल (Hadoti Prajamandal)
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स्थापना – 1934 ई.
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क्षेत्र – कोटा, बूंदी, झालावाड़, बारां आदि हाड़ौती क्षेत्र की रियासतें।
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संस्थापक –
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मुख्य: पं. नयनूराम शर्मा,
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सह–संस्थापक: कुछ स्रोत प्रभुलाल विजय का भी नाम देते हैं।
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आगे चलकर 1938/39 में कोटा प्रजा मंडल –
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नयनूराम शर्मा व अभिनय/अभित्री हरी द्वारा गठित,
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जिसने कोटा रियासत के किसानों व प्रजा के प्रश्न उठाए।
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5.5 धौलपुर प्रजामंडल (Dholpur Prajamandal)
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स्थापना –
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कुछ स्रोत: 1934 ई.,
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कुछ: 1936 ई. – परीक्षाओं के अधिकांश नोट्स में 1934 मिलता है, पर वर्ष को लेकर मतभेद है – यह ध्यान रखना ज़रूरी है।
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संस्थापक / नेता –
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कृष्णदत्त पालीवाल,
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मुलचन्द,
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ज्वाला प्रसाद जिज्ञासु (Jigyasu)।
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विशेष तथ्य:
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यह प्रजामंडल आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानन्द से प्रेरित था।
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5.6 बीकानेर प्रजामंडल (Bikaner Prajamandal)
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स्थापना – 4 अक्टूबर 1936।
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संस्थापक –
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वैद्य मंघाराम वैद्य,
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रघुवर दयाल गोयल।
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विशेष तथ्य:
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यह राजस्थान का एकमात्र प्रजामंडल था जिसकी औपचारिक स्थापना राजस्थान के बाहर (कलकत्ता) में हुई।
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1942 में “बीकानेर स्टेट काउंसिल” का गठन रघुवर दयाल ने किया।
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5.7 मेवाड़ प्रजामंडल (Mewar Prajamandal)
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स्थापना – 24 अप्रैल 1938, उदयपुर।
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संस्थापक – मुख्य श्रेय माणिक्यलाल वर्मा को।
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प्रथम अध्यक्ष – बलवंत सिंह मेहता।
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अन्य प्रमुख सदस्य – भूरेलाल बया (उपाध्यक्ष), रमेशचन्द्र व्यास आदि।
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पहला अधिवेशन –
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25–26 नवम्बर 1941, शाहपुरा हवेली, उदयपुर;
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अध्यक्षता – माणिक्यलाल वर्मा;
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उद्घाटन – जेपी (जे.बी.) कृपलानी ने किया।
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मेवाड़ प्रजामंडल को जल्दी ही अवैध घोषित कर दिया गया,
और 11 मई 1938 को इसे प्रतिबंधित कर, माणिक्यलाल वर्मा को राज्य से निष्कासित किया गया।
5.8 शाहपुरा प्रजामंडल (Shahpura Prajamandal)
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स्थापना – 18 अप्रैल 1938।
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संस्थापक –
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श्री रमेशचन्द्र ओझा,
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लादूराम व्यास,
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अभयसिंह डांगी,
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सहयोग – माणिक्यलाल वर्मा।
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विशेष तथ्य –
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शाहपुरा प्रथम रियासत थी जिसने उत्तरदायी शासन को स्वीकार किया,
इसलिए इसे राजस्थान के प्रजामंडल आन्दोलन में प्रतीकात्मक महत्त्व प्राप्त है।
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5.9 अन्य प्रजामंडल (संक्षेप में)
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जैसलमेर प्रजामंडल –
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संस्थापक: मिथालाल व्यास;
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एक कार्यकर्ता गोपा की जेल में मृत्यु (शहादत) का उल्लेख मिलता है।
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कोटा प्रजा मंडल –
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1938–39 के आस–पास नयनूराम शर्मा व अभिनय/अभित्री हरी द्वारा गठित;
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हाड़ौती क्षेत्र के किसानों की समस्याओं पर केंद्रित।
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6. प्रजामंडल आन्दोलन की कार्यप्रणाली और गतिविधियाँ
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याचिकाएँ एवं प्रतिवेदन –
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प्रजामंडल ने रियासतों के शासकों व ब्रिटिश राजनीतिक एजेंटों को
लगान, बेगार, प्रशासनिक दमन आदि के विरुद्ध ज्ञापन दिए।
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जनसभाएँ और सम्मेलन –
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गाँव–गाँव में सभाएँ, भाषण, पदयात्रा, कीर्तन मंडल आदि के माध्यम से जनता को संगठित किया।
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सत्याग्रह और आन्दोलन –
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कई स्थानों पर कर–बहिष्कार, नज़राना–इंकार, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार, गिरफ्तारी भरने जैसे कार्यक्रम हुए।
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प्रेस और साहित्य –
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स्थानीय समाचार–पत्रों, पर्चों, पैम्फलेटों के माध्यम से दमनकारी नीतियों का विरोध और जनता की समस्याओं का प्रचार।
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कांग्रेस से समन्वय –
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कांग्रेस के प्रस्तावों के अनुसार, प्रजामंडलों ने भी रियासती जनता की समस्याओं को
अखिल भारतीय मंच – States’ People’s Conference आदि में उठाया।
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7. दमन, प्रतिबंध और शहीदियाँ
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अनेक प्रजामंडलों को अवैध घोषित किया गया;
कार्यकर्ताओं पर गिरफ्तारी, जुर्माना, निर्वासन जैसी सज़ाएँ दी गईं। -
मेवाड़ प्रजामंडल –
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गठन के कुछ ही समय बाद अवैध घोषित,
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माणिक्यलाल वर्मा राज्य से निष्कासित;
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कार्यकर्ताओं को जेल, जुर्माना, उत्पीड़न झेलना पड़ा।
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जैसलमेर प्रजामंडल में कार्यकर्ता गोपा की जेल में मृत्यु** को शहादत माना जाता है।
8. प्रजामंडल आन्दोलन के परिणाम और महत्व
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रियासती जनता में अधिकार–चेतना
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प्रजा ने स्वयं को पहली बार “नागरिक (citizen)” के रूप में देखना शुरू किया,
जिनके अधिकार हैं और जो शासन में भागीदारी चाहते हैं।
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उत्तरदायी शासन की दिशा में कदम
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कई रियासतों को
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सलाहकार परिषद,
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आंशिक रूप से चुनी हुई परिषद,
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कुछ हद तक जिम्मेदार मंत्रिमंडल
स्वीकार करने पड़े।
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राजस्थान के एकीकरण की आधार–भूमि
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प्रजामंडलों के नेताओं ने आगे चलकर
राजस्थान के एकीकरण (1948–56) में सक्रिय भूमिका निभाई।
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राष्ट्रीय आन्दोलन से सीधा जुड़ाव
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प्रजामंडलों ने रियासतों को
अखिल भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्य धारा से जोड़ा,
जिससे आज़ादी के बाद रियासतों का भारत संघ में विलय अपेक्षाकृत सहज हुआ।
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नेतृत्व की नई पीढ़ी
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प्रजामंडल आन्दोलन से निकलकर आगे चलकर कई नेता
मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक बने –
जैसे जयनारायण व्यास, हीरालाल शास्त्री, माणिक्यलाल वर्मा आदि।
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9. परीक्षा के लिए त्वरित सार (Quick Revision Points)
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प्रश्न: प्रजामंडल आन्दोलन क्या था?
उत्तर संकेत: देशी रियासतों की प्रजा द्वारा चलाया गया आन्दोलन,
जिसमें जिम्मेदार शासन, नागरिक अधिकारों और शोषण के अंत की मांग की गई। -
प्रश्न: राजस्थान का प्रथम प्रजामंडल कौन–सा था?
उत्तर संकेत: सामान्यतः जयपुर प्रजामंडल (1931) को प्रथम माना जाता है। -
प्रश्न: मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना कब और किसने की?
उत्तर संकेत: 24 अप्रैल 1938, उदयपुर;
संस्थापक – माणिक्यलाल वर्मा,
प्रथम अध्यक्ष – बलवंत सिंह मेहता। -
प्रश्न: हाड़ौती प्रजामंडल के संस्थापक कौन थे?
उत्तर संकेत: पं. नयनूराम शर्मा (सहयोगी – प्रभुलाल विजय आदि), स्थापना – 1934 ई.। -
प्रश्न: धौलपुर प्रजामंडल के प्रमुख नेता कौन थे?
उत्तर संकेत: कृष्णदत्त पालीवाल, ज्वाला प्रसाद जिज्ञासु आदि;
स्थापना वर्ष को लेकर 1934 / 1936 दोनों मिलते हैं –
अधिकांश नोट्स 1934 मानते हैं। -
प्रश्न: शाहपुरा किस कारण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है?
उत्तर संकेत: यहाँ का प्रजामंडल (18 अप्रैल 1938)
– शाहपुरा प्रथम रियासत थी जिसने उत्तरदायी शासन स्वीकार किया।
ये प्रजामंडल आन्दोलन (राजस्थान) के नोट्स RPSC, RAS, स्कूल व्याख्याता, रीट, पटवारी, पुलिस एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए पूरी तरह उपयोगी हैं। आप इन्हें PDF में बदलकर या प्रिंट लेकर भी रिविजन के लिए उपयोग कर सकते हैं।